मुकेश ने राजू से पुछा " आपका ड्राइवर कहाँ है कुछ दिनों से दिखाई नही दे रहा?"
राजू बोला "क्या बताऊँ एक दिन वो मेरा फोन नहीं उठा रहा था तो मैने उससे पूछा बस इसी बात पर मुझसे गुस्सा हो कर चला गया।"
"सुनने में आया की उसकी आर्थिक हालात ठीक नही है इसलिए वो अपने बीबी बच्चो सहित अपने ससुराल चला गया है ।" राजू ने आगे कहा। "उसको मेने दो बार फोन भी किया लेकिन वो मना कर रहा था काम करने के लिए"
मुकेश बोला "आजकल के लड़को में इतनी गर्मी कैसे आ गई है भूखे मर जायेंगे लेकिन सुलह नहीं करेंगे और चाहे बेरोजगार रहना पड़े लेकिन अकड़ नहीं जायेगी।"
मुकेश आगे बोला "हम जब जवान थे तो नॉकरी के लिए बहुत कुछ सुनते थे।"
राजू बोला "ये सब खान पान और संगति का असर है जो युवको को विन्रम रहने की जगह उग्र बना रहा है और इस हिसाब से तो आगे का समय और भी खराब होगा।"
मुकेश ने कहा "तुम बिलकुल सच कह रहे हो ना जाने आगे क्या समय आने वाला है?"
राजू और मुकेश भविष्य की सोच में खो गए
Wednesday, October 5, 2016
बेरोजगारी की अकड़
Monday, October 3, 2016
अहिंसा
में जैसे ही मॉल से बाहर निकला तो देखा की एक युवक एक महंगी कार के पीछे भाग रहा था और कार के ड्राईवर साइड के शीशे पर हाथ मार कर ड्राईवर को बाहर आने को कह रहा था।
ड्राईवर ने अन्दर से ही इशारे से पुछा "क्या हुआ?" तो बाहर वाले युवक ने गुस्से में कहा "बाहर निकल तूने गाडी बेक करते व्यक्त मेरी खड़ी गाडी में खरोंच मारी है।"
सुनते ही कार में बेठा युवक गुस्से में बाहर आया और बाहर वाले युवक से बोला "तूने गाडी के हाथ कैसे लगाया, दोबारा लगा के दिखा फुटबॉल बना दूंगा थोड़ी ही तो खरोच है गाडी में।"
इतना सुनते ही पहला वाला युवक सहम गया और ढीला पड़ गया।
कार वाला युवक कार में बैठते हुए बोला "ये मत समझना की आज गाँधी जयंती है तो में चुपचाप अहिंसा से तुम्हारी बाते सुन लूँगा।" और वह कार लेकर चला गया।
वहां खड़ा बुजुर्ग बोला "वाकई यदि कार वाला युवक थोडा सख्त नहीं बोलता तो बाहर वाला युवक उसकी पिटाई कर देता।
इसपर दूसरा बुजुर्ग बोला "सही कहते हो आज के समय में छोटी हिंसा को उससे थोड़ी बड़ी हिंसा से ही हराया जा सकता है और अहिंसा तो बातो में ही ठीक लगती है।"
Saturday, October 1, 2016
बरसात का फर्क
बरसात का फर्क
राजू आज ही शहर से अपने दादाजी के गाँव आया था।
तेज बरसात हो रही थी।
दादाजी का घर मिटटी का बना था और छत घास फूस की बनी थी।
तेज बरसात के कारण छत से पानी टपक रहा था जिससे कच्ची जमीन पर छोटी नाली बन गई थी और पानी दादाजी और राजू की खाट के नीचे से निकल कर खुले आँगन में जा रहा था। राजु ये देख कर आश्चर्यचकित था की दादाजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
उसने उत्सुकता से पुछा "दादाजी बारिश का पानी छत से टपक रहा है लेकिन आप इसके लिए कुछ नहीं कर रहे जबकि हमारे शहर के घर में यदि बारिश का पानी टपकता है तो मम्मी पापा परेशान हो जाते है और पूरा घर पानी से भर जाने के कारण बहुत बेकार लगता है।"
दादाजी ने प्यार से राजू के सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोले।"राजू शहर में बरसात आने पर पानी इक्कठा हो जाता है क्योंकि ना तो उसको निकलने का कोई रास्ता है और ना ही वो जमीन के अन्दर जा सकता है इसलिए की शहर में लोगो ने जमीन को सीमेंट और तारकोल से पक्का कर दिया है, जिसके कारण वहां गंदगी फेल जाती है। यहाँ गाँव में पानी जमीन में चला जाता है और यदि इक्कठा होता है तो वो गाँव से दूर तालाब में इक्कठा होता है।" थोड़ी देर रूककर दादाजी बोले "रही पानी टपकने की बात तो देखो हमे तो इसे देख कर आनन्द की अनुभूति हो रही है इसलिए की ये बाहर जा रहा है शहरों की तरह मकानों में ही रूक नहीं रहा।"
राजू ने महसूस किया की दादाजी ठीक कह रहे है। यहाँ का टपकता पानी उसे बिलकुल भी खराब नहीं लग रहा था।
राजू भी अब उस टपकते पानी को देख कर आनन्द ले रहा था।
राजू सोच रहा था की वाकई शहर और गाँव की बरसात में फर्क है।
रोटी के लिए
रोटी के लिए
पहली बार दिनेश का बुजुर्ग पिता शहर में आये थे।
रेलवे स्टेशन से बाहर आकर दिनेश ने ऑटो किराये पर लिया और उसमे अपने पिता के साथ अपने घर की तरफ चल दिए।
आधा रास्ता पार हुआ तो दिनेश के बुजुर्ग पिता बोले "बेटा ये शहर में सब लोग इधर से उधर भाग रहे है कोई स्कूटर से भाग रहा है कोई अपनी गाडी से भाग रहा है में देख रहा हूँ की किसी को एक दुसरे से बात करने का समय ही नहीं है ऐसा क्या हुआ है इन लोगो के साथ?"
दिनेश बोला "देखा पिताजी आप कहते हो ना की शहर में तुम क्या करते हो और मुझे कहते रहते हो की गाँव वापिस आ जाओ शहर ने क्या रखा है...आप ही देख लो लोग रोटी के लिए कितनी भाग दौड़ करते है।"
दिनेश के बुजुर्ग पिता थोड़ी देर सोच कर बोले "बेटा मेरे बाल ऐसे ही सफेद नही हुए है, ये दौड़ रोटी के लिए नही बल्कि ऐशो आराम की चीजो के लिए हो रही है क्योंकि रोटी अभी भी इतनी महंगी नहीं हुई की इंसान उसे इतनी मेहनत करके भी न पा सके।"
दिनेश को अपने पिता की बात सच लगी थी वाकई हम रोटी के नाम पर ऐशो आराम के पीछे भाग कर शहरो में अपना जीवन व्यर्थ कर रहे है। जिससे हम एक दुसरे से बाते करना ही भूल गए है और जीवन कैसे जीते है ये प्रश्न तो हमसे काफी पीछे छूट गया है।
Friday, September 30, 2016
श्राद्ध
वृद्ध आश्रम के बाहर भारी भीड़ थी।
पुरे शहर के गरीब और भिखारी जमा थे।
आज किसी अमीर आदमी का श्राद्ध था और इसलिए उसका बेटा सबको खाना खिलाने वाला था।
वृद्ध आश्रम की दो नर्स आपस में बात कर रही थी।
एक बोली "कितने भाग्यशाली हे वो माँ बाप जिनका इतना श्रवण जेसा बेटा है जो उनका श्राद्ध इतने बड़े स्तर पर कर रहा था।"
दूसरी बोली "अरे क्या श्रवण हें, मैंने सुना है की उनका नौकर कह रहा था की ये बेटा इसलिए श्राद्ध करा रहा था क्योंकी उसके माँ बाप मर गए है तो उसे अब इस वृद्ध आश्रम में उनके रहने के पैसे नहीं देने पड़ेंगे।"
पहले वाली नर्स बोली " इसका मतलब ये श्राद्ध नही बिज़नस में प्रॉफिट की पार्टी है।"
इतना सुनकर दूसरी नर्स हसने लगी।
दूर जिनका श्राद्ध था वो दोनों फोटो में भी पीड़ा की मुस्कान लिए मुस्कुरा रहे थे।
Thursday, September 29, 2016
भारत पाकिस्तान
दिवाली के कपडे
दिवाली के कपडे
मकान मालकिन दिवाली पर घर की साफ़ सफाई करवा रही थी।
उसका बेटा भी उसके साथ था।
पास में ही उनकी नोकरानी अपने बेटे के साथ घर की सफाई कर रही थी।
नौकरानी का बेटा भी मालकिन के बेटे की उम्र का ही था।
"बेटा ये कपडे पहन लेना दिवाली पर" मालकिन ने पिछले साल के कपडे निकालकर अपने बेटे को कहा।
इस पर बेटा बोला "माँ अब तो ये एक साल पुराने हो गए मुझे नये कपड़े चाहिए ये में दिवाली पर नही पहनूंगा।" माँ ने दुलार से कहा "बेटा ये बड़े महंगे कपड़े है और देखो नये ही तो हैं।" बेटे ने इठलाते हुए कहा "माँ कह दिया ना में नही पहनूंगा तो नही पहनूंगा मुझे नये चाहिए।" माँ ने भी वारी जाऊं वाली शक्ल बनाई और मुस्करा कर कहा "ठीक है नये ले लेना बस"
उसका बेटा बड़ा खुश हुआ।
उधर नोकरानी और उसका बेटा ये सब देख और सुन रहे थे। नोकरानी ने अपने बेटे के फटे कपड़ों की तरफ देखा। उधर उसका बेटा ललचाई निगाहों से मालकिन के बेटे के पुराने कपड़ो को देख रहा था।
नोकरानी समझ गई थी और अब उसका दिल भर आया।
उसने बड़ी मुस्किल से कहा "मालकिन ये पुराने कपड़े यदि आप मेरे बेटे को दे देंगी तो मेरे बेटे का भी दिल खुश हो जाएगा।"
मालकिन ने थोड़ी देर सोचा और कहा "ठीक हें ये लो कपडे।"
कपड़े लेकर नोकरानी का लड़का बहुत खुश हुआ।
इधर दोनों मालकिन और नोकरानी माँ खुश थी की उनके बेटे खुश है।
अंतर सिर्फ जरूरत का था।