Saturday, October 1, 2016

बरसात का फर्क

बरसात का फर्क
राजू आज ही शहर से अपने दादाजी के गाँव आया था।
तेज बरसात हो रही थी।
दादाजी का घर मिटटी का बना था और छत घास फूस की बनी थी।
तेज बरसात के कारण छत से पानी टपक रहा था जिससे कच्ची जमीन पर छोटी नाली बन गई थी और पानी दादाजी और राजू की खाट के नीचे से निकल कर खुले आँगन में जा रहा था। राजु ये देख कर आश्चर्यचकित था की दादाजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
उसने उत्सुकता से पुछा "दादाजी बारिश का पानी छत से टपक रहा है लेकिन आप इसके लिए कुछ नहीं कर रहे जबकि हमारे शहर के घर में यदि बारिश का पानी टपकता है तो मम्मी पापा परेशान हो जाते है और पूरा घर पानी से भर जाने के कारण बहुत बेकार लगता है।"
दादाजी ने प्यार से राजू के सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोले।"राजू शहर में बरसात आने पर पानी इक्कठा हो जाता है क्योंकि ना तो उसको निकलने का कोई रास्ता है और ना ही वो जमीन के अन्दर जा सकता है इसलिए की शहर में लोगो ने जमीन को सीमेंट और तारकोल से पक्का कर दिया है, जिसके कारण वहां गंदगी फेल जाती है। यहाँ गाँव में पानी जमीन में चला जाता है और यदि इक्कठा होता है तो वो गाँव से दूर तालाब में इक्कठा होता है।" थोड़ी देर रूककर दादाजी बोले "रही पानी टपकने की बात तो देखो हमे तो इसे देख कर आनन्द की अनुभूति हो रही है इसलिए की ये बाहर जा रहा है शहरों की तरह मकानों में ही रूक नहीं रहा।"
राजू ने महसूस किया की दादाजी ठीक कह रहे है। यहाँ का टपकता पानी उसे बिलकुल भी खराब नहीं लग रहा था।
राजू भी अब उस टपकते पानी को देख कर आनन्द ले रहा था।
राजू सोच रहा था की वाकई शहर और गाँव की बरसात में फर्क है।

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