गरीब
राजू की माँ अपना काम खत्म करके झोपडी से बाहर आकर राजू के साथ फूटपाथ पर लेट गई।
राजू के हाथ में एक अख़बार का टुकड़ा था वो उसे लेटे हुए ही पढ़ रहा था ।
माँ को देखते ही राजू बोला " माँ देखो जो सामने महल जैसी बिल्डिंग बनी है उसके बारे में लिखा है की इसके अन्दर 150 कमरे है, 600 नौकर है, इसके अन्दर ही हेलीकाप्टर उतर सकता है, इसमें कसरत करने की जिम है, 150 कार खड़ी करने की जगह है और ये 35 मंजिल की है। इस बिल्डिंग के मालिक के बच्चे हेलीकाप्टर से स्कूल जाते है और इसकी मालकिन 50 लाख की साडी पहनती है और डेढ़ करोड़ की चाय पीती है।"
इतना कह कर राजू चुप हो गया।
कुछ देर चुप होकर राजू फिर बोला "माँ देखो ना हम तो कच्ची झोपडी में रहते है और फूटपाथ पर सोते है और हमे सही से रोटी भी नसीब नही होती, और तो और में स्कूल बड़ी मुस्किल से जा पाता हूँ क्योंकि पिताजी मेरी फीस नहीं दे पाते, क्या हमारा नसीब ख़राब है?"
माँ जो पुरे दिन के काम से निढाल थी उसने डांटते हुए राजू को कहा "चुपचाप सो जाओ इन फालतू बेकार की चीजों पर ध्यान मत दो।" डांट सुनकर राजू ने आँखे बंद कर ली।
माँ ने भी करवट ली और आँखों में आंसू लेकर बडबडाने लगी, हम तो गरीबी और भुखमरी से पहले ही पस्त है उपर से अमीरी का इतना गुणगान करवाते है ये लोग अखबारों में की कई बार तो गरीब लोग अपने जीवन से ही घृणा करने लगते है। अरे भई अमीर हो तो ठीक है लेकिन अमीरी दिखा कर गरीब का उपहास तो मत करो।"
उधर राजू आँख बंद किये अपने नसीब को कोस रहा था की उसके पास ये सब क्यों नहीं है।
राजू के दिल में नकारात्मक सोच ने घर कर लिया था।
माँ सोच रही थी कल किसी और फूटपाथ पर जाकर रहेंगे ताकि राजू इस बिल्डिंग को देख ना सके और उसके दिमाग में यदि कोई नकारात्मक सोच घुसी हो तो वो उसे भूल जाए।
राजू की माँ अपना काम खत्म करके झोपडी से बाहर आकर राजू के साथ फूटपाथ पर लेट गई।
राजू के हाथ में एक अख़बार का टुकड़ा था वो उसे लेटे हुए ही पढ़ रहा था ।
माँ को देखते ही राजू बोला " माँ देखो जो सामने महल जैसी बिल्डिंग बनी है उसके बारे में लिखा है की इसके अन्दर 150 कमरे है, 600 नौकर है, इसके अन्दर ही हेलीकाप्टर उतर सकता है, इसमें कसरत करने की जिम है, 150 कार खड़ी करने की जगह है और ये 35 मंजिल की है। इस बिल्डिंग के मालिक के बच्चे हेलीकाप्टर से स्कूल जाते है और इसकी मालकिन 50 लाख की साडी पहनती है और डेढ़ करोड़ की चाय पीती है।"
इतना कह कर राजू चुप हो गया।
कुछ देर चुप होकर राजू फिर बोला "माँ देखो ना हम तो कच्ची झोपडी में रहते है और फूटपाथ पर सोते है और हमे सही से रोटी भी नसीब नही होती, और तो और में स्कूल बड़ी मुस्किल से जा पाता हूँ क्योंकि पिताजी मेरी फीस नहीं दे पाते, क्या हमारा नसीब ख़राब है?"
माँ जो पुरे दिन के काम से निढाल थी उसने डांटते हुए राजू को कहा "चुपचाप सो जाओ इन फालतू बेकार की चीजों पर ध्यान मत दो।" डांट सुनकर राजू ने आँखे बंद कर ली।
माँ ने भी करवट ली और आँखों में आंसू लेकर बडबडाने लगी, हम तो गरीबी और भुखमरी से पहले ही पस्त है उपर से अमीरी का इतना गुणगान करवाते है ये लोग अखबारों में की कई बार तो गरीब लोग अपने जीवन से ही घृणा करने लगते है। अरे भई अमीर हो तो ठीक है लेकिन अमीरी दिखा कर गरीब का उपहास तो मत करो।"
उधर राजू आँख बंद किये अपने नसीब को कोस रहा था की उसके पास ये सब क्यों नहीं है।
राजू के दिल में नकारात्मक सोच ने घर कर लिया था।
माँ सोच रही थी कल किसी और फूटपाथ पर जाकर रहेंगे ताकि राजू इस बिल्डिंग को देख ना सके और उसके दिमाग में यदि कोई नकारात्मक सोच घुसी हो तो वो उसे भूल जाए।
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