Saturday, August 1, 2020

लघुकथा आज के संदर्भ में

डॉक्टर साहब
रज्जो का रोकर बुरा हाल था। उसका आदमी थोड़ी देर पहले ही इलाज न मिलने की वजह से मर गया था। वह समय पर अस्पताल से पांच रुपये की पर्ची नही कटा पाई थी। खाने को पैसे नही थे तो इलाज के लिए पांच रुपये कहाँ से आते।
लाश गेट पर ही थी।
तभी बड़े डॉक्टर साहब आये। वार्ड बॉय ने डॉक्टर को सारा माजरा बताया।
डॉक्टर साहब बहुत गुस्सा हुए। सब स्टाफ को बुरी तरह डाँट लगाई की एक पांच रुपये की पर्ची की वजह से मरीज मर गया । डॉक्टर को आत्मग्लानि हो रही थी।
वह रज्जो के पास आया और उससे अपने अस्पताल की तरफ से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी।
रज्जो अभी भी रो रही थी।
'डॉक्टर साहब इसमें किसी की गलती नही। मेरे पति ने ही किसी के आगे हाथ फैलाने से मना किया था, हम सब दो दिन से भूखे है वो मर गए लेकिन हाथ नही फैलाया।' वह अपने आंसू पोंछते हुए बोली, उसने अपने नन्हे बच्चे को कंधे से लगा लिया।
डॉक्टर साहब ने अपनी जेब से निकाले पैसे वापिस रख लिए जो वो उसे देने वाला था लेकिन उसकी खुद्दारी देख वह भी आश्चर्यचकित था। वह समझ गया था कि ये परिवार मर जायेगा लेकिन पैसे नही लेगा।
डॉक्टर अपने रूम में पहुंचा और वार्ड बॉय को बुलाकर कुछ समझाया।
वार्ड बॉय वापिस लाश के पास आया। उसने रज्जो को आवाज देकर लाश के पास बुलाया और कहा 'इनका अंतिम संस्कार करना है इनकी जेब देख लो कोई सामान तो नही है।' रज्जो जानती थी कि क्या मिलेगा उनकी जेब मे लेकिन जब वार्ड बॉय ने कहा कि ये रूल है तो रज्जो ने अपने पति की पेंट की जेब टटोली, उसमें 2700 रुपये थे। रज्जो को विश्वास नही था कि उनके पास इतने पैसे थे तो उन्होंने इलाज के लिए पैसे क्यों नही निकाले? वह निरुत्तर थी। वार्ड बॉय लाश को हॉस्पिटल में ले गया। उसकी आंखों में डॉक्टर साहब के प्रति सम्मान था। उन्होंने ही ये पैसे रज्जो के पति की जेब मे रखवाए थे और उसका अंतिम संस्कार भी अपने पैसो से कराने को कहा था। उन्होंने एक एन जी ओ को भी फ़ोन किया और स्वाभिमानी रज्जो के लिए काम का बंदोबस्त कर दिया ताकि वह अपने पति की तरह इज्जत की जिंदगी जी सके।
रज्जो अपने पति को अंतिम बार देख अपने बच्चे को ले हॉस्पिटल से निकल गई।
डॉक्टर साहब मायूस थे लेकिन उन्होंने आवाज दी 'सिस्टर, एक एक करके पेशेंट भेजना शुरू करो।'
उन्होंने मानव धर्म निभा दिया था और अब कर्म की बारी थी।

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Sunday, May 31, 2020

कभी तो होगा न्याय

मेरा क्या कसूर!

क्या न्याय मिलेगा
क्या कोई बताएगा क्या गलती है मनुष्य की
उसने क्या किया की
इतनी मृत्यु हो गई
वो तो पाल रहा था अपना परिवार
वो तो लड़ रहा था गरीबी भूख से
उसकी क्या गलती थी
जो बेरोजगार हो गया चला अपने घर की ओर
पैदल ही, मर गया रेल ट्रैक पर
मर गया भूख गर्मी से
दे रहीं है माताएं बहने खुले में बच्चों को जन्म
दे रही नया जीवन फिर मरने के लिए
क्या गलती है उनकी, यही की फिर कोई देश वायरस फैलाये
ओर मर जाये कोई निर्दोष बिना गलती के
कोई करेगा न्याय या दोहरी मार पड़ती रहेगी उस निर्दोष गरीब पर
शायद नही लेकिन प्रकृति नही छोड़ेगी उनको देगी भूकम्प देगी तूफान, देगी टिड्डियाँ
लेकिन क्या कोई न्याय करेगा उस देश के खिलाफ जो फैलाता है वायरस
इंतजार है
कभी तो कुदरत भी न्याय करेगी विध्वंस छोड़ कर।

Wednesday, May 13, 2020

मेरा लेखन

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थोड़ा हँस भी लो ...

तेरा नाश जाये कोरोना

तूने सबको घर मे पकड़ा दिया एक कोना
तेरा नाश जाये कोरोना

अब घर मे सिर्फ खाना पीना ओर सोना
तेरा नाश जाये कोरोना

तूने छीन लिया लड़कियों का पानी पुरी का दोना
तेरा नाश जाये कोरोना

अब मिल नही पा रहे बाबू शोना
तेरा नाश जाये कोरोना

रुक गए सब शादी और गोना
तेरा नाश जाये कोरोना

मर्दो को पड़ रहे है कपड़े और बर्तन धोना
तेरा नाश जाये कोरोना

घर बैठी है वो जो कहती थी शॉपिंग चलो ना
तेरा नाश जाये कोरोना

व्हिस्की और चखने के लिए पड़ रहा है रोना
तेरा नाश जाये कोरोना

बाहर निकलने पर पुलिस तोड़ रही शरीर का हर कोना
तेरा नाश जाये कोरोना

कमीने चीन का करा हमे पड़ रहा है ढोना
तेरा नाश जाये कोरोना

तेरे आगे हर बीमारी हो गयी बोना
तेरा नाश जाये कोरोना

अमरीका वाले ट्रम्प को आ रहो रोना
तेरा नाश जाये कोरोना

Monday, January 30, 2017

पब्लिसिटी

संजय लीला भंसाली को करणी सेना के लोगो ने फिल्म शूटिंग के सेट पर थप्पड़ मारे,  क्या आपको इसमें सच्चाई नजर आती है? वजह ये हैं भंसाली के पास पर्सनल गार्ड है जिनके पास हथियार थे क्या वे भंसाली को हाथ भी लगाने देंगे, जब उनको थप्पड़ मारे तो कोई और फिल्म का कलाकार नहीं था जैसे की शहीद कपूर या दीपिका पादुकोण इत्यादि। तो मुझे तो ये एक फिल्म को प्रमोट करने का पब्लिसिटी स्टंट लग रहा है। भारत में तो ये होता ही है की जितनी विवादित फिल्म होगी उसकी हिट होने के उतने चांस है। मुझे तो भंसाली को जान बुझ कर इस विवाद को हवा देने की बू आ रही है। यदि भंसाली विवादित सीन को हटा दे तो सब ठीक हो सकता था लेकिन पब्लिसिटी कहाँ से मिलती फ्री में ।

Saturday, January 28, 2017

चुनावबाजी

हमने रंगबाजी का नाम तो सुना था लेकिन चुनावी माहौल में एक शब्द और जहन में आता है जो रंगबाजी का पर्याय हो सकता है वो है चुनावबाजी क्योंकि जैसे ही चुनाव आते है सब नेताओ की जुबान आउट ऑफ कंट्रोल हो जाती है। अब सब नेता एक दूसरे पर ऐसी ऐसी बातों का इल्जाम लगाएंगे की यदि उन बातों को वो अपने परिवार के साथ बैठ कर करें तो शायद वो उनको मुँह दिखाने लायक ना रहे। लेकिन भारत एक गणतंत्र राष्ट्र है और सबको बोलने की आजादी है। साथ ही साथ चुनाव आयोग नाम का कानून भी है लेकिन वो बेचारा बस चेतावनी देने भर का काम करता है। आज तक के इतिहास में कभी सुना है कि चुनाव आयोग ने किसी को भी अभद्र और अनैतिक भाषा बोलने के कारण चुनाव लड़ने से बेदख़ल किया हो या उसका नामांकन रदद् किया हो। तो क्यों हुई न रंगबाजी नेताओं द्वारा चुनावबाजी के रूप में।